मंगलवार, 9 जनवरी 2024

Agastya Rishi ने क्यों अपनी बेटी से शादी की - Agastyamuni

 राजा दशरथ के गुरु Agastya Rishi एक ऐसे प्रसिद्ध ऋषि थे जिन्होंने देवताओं की रक्षा के लिए सात समुद्रों को पी लिया था। Rishi Agastya शिव भक्त थे,इस लेख में यह जानकारी दी गई है कि Agastya Rishi ने क्यों अपनी बेटी से शादी की । अगस्त्य ऋषि सप्त ऋषियों में से एक थे। इन्होंने अपने तपस्या काल में कई मंत्रों की शक्ति को देखा था। अगस्त्य ऋषि को मंत्र दृष्टा ऋषि भी कहा जाता है। देवासुर संग्राम के समय सभी दानव हारने के बाद समुद्र तल में जाकर छुप गए थे। भगवान शिव से आज्ञा पाने के बाद अगस्त्य ऋषि ने सात समुंदरों का जल पी लिया था, और उसके बाद सभी राक्षसों का संहार हुआ था। हमारे इतिहास में कई ऐसी घटनाएं हैं जिनका हमें आज तक पता नहीं है, पुराणों में ऐसा कहा जाता है कि, देवताओं की रक्षा के लिए अगस्त्य ऋषि ने अपनी बेटी से शादी की थी। लेकिन आखिर ऐसी क्या स्थिति रही होगी जिसके कारण की Agastya Rishi ने अपनी ही बेटी लोपामुद्रा से शादी की? अगस्त्य ऋषि ने अपने तपोवल से अपनी संतान को प्राप्त किया था, लेकिन जब उनको पता चला कि विदर्भ का राजा संतान प्राप्त के लिए तप कर रहे हैं तो, उन्होंने अपनी बेटी लोपामुद्रा को उन्हें गोद दे दिया था। उनकी शादी के लिए देवताओं का मत था कि तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार आत्मा को देखा जाता था रिश्तों की मर्यादा को नहीं। ‌ आज की स्थिति के अनुसार पूर्व की स्थिति को भांपा भी नहीं जा सकता है। आज की स्थिति के अनुसार अपनी बेटी से शादी करना अनैतिक माना जाता है।‌ 


अगस्त्य ऋषि

अगस्त ऋषि को राजा दशरथ के राजगुरु के रूप में भी जाना जाता है अगस्त्य ऋषि को पुलस्त्य ऋषि का बेटा माना जाता है। उनके भाई का नाम विश्रवा था जो रावण के पिता थे पुलस्त्य ऋषि ब्रह्मा के पुत्र थे, अगस्त्य ऋषि की पत्नी लोपामुद्रा विद्वान व वेदज्ञ थी। Agastya Rishi के भारत देश में बहुत से आश्रम है जिसमें से प्रमुख रूप से तमिलनाडु में, महाराष्ट्र में, और उत्तराखंड में प्रसिद्ध मंदिर हैं। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के एक शहर अगस्त्यमुनि में अगस्त्य ऋषि का एक मंदिर है। जंहा अगस्त्य ऋषि का प्रसिद्ध आश्रम हुआ करता था। अगस्त्यऋषि ने इस स्थान पर कठोर तपस्या की थी, और यहां अतापि और वातापी नामक दो राक्षसों का वध भी किया था। यहां प्रतिदिन पूजा अर्चना की जाती है आरती की जाती है, और निकटतम गांव के लोग अगस्त्य ऋषि को मुनि महाराज के रूप में अपना इष्ट देव स्वीकार करते हैं। इस मंदिर के मठाधीश बेंजी नामक गांव से बनाए जाते हैं। इस मंदिर के चारों ओर स्थानीय निवासीयों के घर है। स्थानीय निवासियों में यह मान्यता प्रसिद्ध है कि अगस्त्य ऋषि के मंदिर से ऊंचा इस क्षेत्र में किसी का भी घर नहीं हो सकता है यदि इस मंदिर से ऊंचा किसी का घर बनाया जाता है तो उसको इसके बुरे परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।

   अगस्तमुनि नामक स्थान में कुछ लोग Agastya Rishi को अपनी जमीन की मिट्टी देते हैं, उसके बाद वह जमीन अगस्त्य ऋषि की हो जाती है, उस जमीन पर दोबारा कोई घर नहीं बना सकता है, यदि किसी ने उसके बाद उस जमीन पर घर बनाने का प्रयास किया तो उसको इसके भयानक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं, कुछ लोग विवादित जमीन को अगस्त्यमुनि में मुनि महाराज को चढ़ा देते हैं, उसके बाद वह जमीन अगस्त्य ऋषि के नाम हो जाती है और बंजर रहती है। और उस जमीन पर कोई भी खेती नहीं कर सकता है। उसके बाद वह जमीन सिर्फ गायों के चारागाह के रूप में जानी जाती है। कुछ लोगों की मान्यता है कि अगस्त्य ऋषि को चडाई गई जमीन में सांपों का निवास रहता है। अगस्त्य ऋषि को जमीन सिर्फ आसपास के क्षेत्र के लोग ही नहीं चढ़ाते बल्कि दूर दराज के लोग भी अगस्त्य ऋषि को अपनी जमीन चढ़ावा देते हैं। कुछ लोग अन्य संपत्ति जैसे की गाय, बैल, भैंस भी अगस्त्य ऋषि को दान करते हैं। 

   अगस्त्यमुनि मंदिर में जाना बहुत ही आसान है अगस्त्यमुनि मंदिर में जाने के लिए सबसे पहले उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में प्रवेश करना होगा। इसके बादर रुद्रप्रयाग नामक स्थान से 18 किलोमीटर की दूरी पर अगस्त्यमुनि नामक स्थान में आना होगा। यहां पर सड़क से बहुत ही नजदीक अगस्त्य ऋषि का प्रसिद्ध मंदिर है।

   तमिलनाडु के तिरुपति में भी अगस्त्य ऋषि का एक प्रसिद्ध आश्रम है, कुछ प्रसिद्ध मान्यताओं के अनुसार विंध्याचल पर्वत का घमंड बड़ा और वह अपनी ऊंचाई को बहुत अधिक बढ़ता जा रहा था, जिसके कारण की सूर्य की ऊर्जा धरती तक पहुंचने में असमर्थ थी। बिना सूर्य की ऊर्जा के धरती पर जीवन संभव नहीं था, यह देखते हुए देवताओं ने Agastya Rishi से यह प्रार्थना की , कि वह अपने शिष्य विंध्याचल पर्वत को समझाएं, तब Agastya Rishi ने विंध्याचल से कहा कि मुझे दक्षिण में जाना है, मुझे मार्ग दो विंध्याचल अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए अगस्त्य ऋषि के चरणों में झुके और अगस्त्य ऋषि विंध्याचल को लांग कर दक्षिण में चले गए, उसी समय अगस्त्य ऋषि ने विंध्याचल से कहा था कि मेरे आने तक झुके ही रहना उसके पश्चात अगस्त्य ऋषि दक्षिण में चले गए और वही आश्रम बनाकर तप करने लगे और वहीं रहने लगे।

   अगस्त्य का एक प्रसिद्ध आश्रम महाराष्ट्र के अहमदनगर नामक जिले के अकोले में स्थित है यह आश्रम प्रवरा नदी के तट पर स्थित है Agastya Rishi ने रामायण काल में इस आश्रम में निवास किया था, कुछ मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब महर्षि अगस्त्य की उपस्थिति इस स्थान पर हुई तो सभी प्राणीं दुश्मनी भूल गए थे।


Agastya Rishi ने क्यों अपनी बेटी से शादी की?

अगस्त्य ऋषि ने अपने तपोबल से अपनी बेटी लोपामुद्रा को प्राप्त किया लेकिन जब वह पाते हैं कि, विदर्भ के राजा संतान प्राप्ति के लिए तप कर रहे हैं तो वह लोपामुद्रा को उन्हें गोद दे देते हैं। लेकिन कुछ समय के बाद जब लोपामुद्रा जवान हुई, तब ऋषि अगस्त्य ने राजा से उसका हाथ मांग लिया। राजा ने Agastya Rishi के श्राप के भय से लोपामुद्रा का विवाह अगस्त्य ऋषि से करा दिया। इसके बाद Agastya Rishi ने लोपामुद्रा की पूर्ण सहमति से दो संतानों को जन्म दिया। जिसमें से एक का नाम भृंगी ऋषि था और दूसरे का नाम अचुता था। भृंगी ऋषि शिव के परम भक्त थे। इस शादी के लिए देवताओं का मत था कि तत्कालीन परिस्थितियों के हिसाब से आत्मा को देखा जाता था ना कि रिश्तो की मर्यादा को।


अगस्त्य ऋषि का योगदान

अगस्त्य ऋषि प्रसिद्ध चिकित्सा पद्धति 'सिद्ध वैद्यम्' के जनक कहे जाते हैं यह चिकित्सा पद्धति दक्षिणी चिकित्सा पद्धति है। एक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने अपने पुत्र मरूगन को वर्मक्कलै नि:शस्त्र युद्ध कला शैली सिखायी थी। मुरूगन यानिकी कार्तिकेय ने यह कला अगस्त्य को सिखायी और अगस्त्य ऋषि ने यह कला अन्य सिद्धरों को सिखायी। Agastya Rishi ने अगस्त्य संहिता की भी रचना की थी, यह ग्रंथ बहुत ही प्रसिद्ध है। इस ग्रंथ पर विभिन्न शोध किए गए और इन शोध में इस ग्रंथ की उपयोगिता को सही पाया गया। इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र भी मिलते हैं। 


अगस्त्य ऋषि ने की रामजी की सहायता की

जब भगवान राम को वनवास हुआ तो उसके बाद एक समय पर भगवान राम, उनके भाई लक्ष्मण और उनकी पत्नी सीता ऋषि अगस्त्य के आश्रम में पहुंचे थे। वहां जाकर उन्होंने विश्राम किया । उस समय Agastya Rishi ने भगवान राम को यह सलाह दी कि उनको किस दिशा में जाना है। रावण से लंबे समय तक युद्ध के बाद भगवान राम थक थे, क्योंकि वह उस समय रावण को मारने में सक्षम नहीं हो पा रहे थे। उस समय भगवान राम को सलाह देने के लिए देवों ने अगस्त्य ऋषि को भगवान राम के पास भेजा था। Agastya Rishi ने भगवान राम को सलाह दी कि उनको सूर्य भगवान के आदित्यहृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। इससे उन्हें रावण को मारने की क्षमता प्राप्त होगी। 


निष्कर्ष

ऋषि मुनियों का जीवन हमेशा संघर्षों में ही रहता है इस बात में कोई दो मत नहीं है, लेकिन कुछ ऋषि मुनियों का जीवन अत्यधिक कठोर होता है जिनमें अगस्त्य ऋषि का नाम भी प्रसिद्ध है। अगस्त्य ऋषि ने देवताओं की सहायता की और राक्षसों का वध भी किया। अगस्त्य ऋषि शिव के भक्त थे। उन्होंने उज्जैन में शिव की उपासना की थी जहां वर्तमान में अगस्त्येश्वर नामक शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। सिर्फ इस आधार पर की Agastya Rishi ने लोपामुद्रा से विवाह किया उनको अनैतिक कहा जाता है लेकिन कुछ विध्वान का यह मानना है कि लोपामुद्रा उनकी अपनी संतान नहीं थी। लोपामुद्रा को उन्होंने तपोबल से प्राप्त किया था। और उसके बाद लोपामुद्रा का लालन पालन भी उन्होंने स्वयं नहीं किया था। लोपामुद्रा का लालन पालन विदर्भ के राजा ने किया था। और लोपामुद्रा के जवान होने के बाद उन्होंने लोपामुद्रा से शादी की थी। किसी भी कार्य को सही या गलत ठहराने से पूर्व तत्कालीन परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। सिर्फ एक पक्ष को ध्यान में रखकर सही या गलत का निर्णय नहीं किया जा सकता है। ऋषि अगस्त्य ने ऐसे विभिन्न कार्य किए जिनको कोई भी सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता, इसलिए कहा जा सकता है कि ऋषि अगस्त्य एक महान और असामान्य ऋषि थे। वैसे तो सभी ऋषि मुनि महान और अद्भुत ही होते हैं, लेकिन अगस्त्य ऋषि के कठोर तप और संघर्षों के आधार पर इनको अन्य ऋषि मुनियों से सर्वश्रेष्ठतम कहना उचित होगा। 

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